बुधवार, 13 जुलाई 2011

DHAMKE JO KABHI SUNAYI NAHI DETE-

mumbai 13/7 teen serial dhamke ,26/11 ko huae teen mahine bhi nahi huae hain ,aj atankia ne mumabi ko kasab ke mehman banane ka ek or

reward de dala,blast hota hain kitne mare ghyal huae iski ginti bade asani se ho jati hain aise, bata dun apko marne wale ki sankhya 20 hain or 200 se

adhik  ghyal lekin marne walo ki ginti aj tak na ho payi hain,       badle ek admi ki kimat 5 lakh ho jati hain ,muwaja bada halka shabd hain


akhir sarkar kab tak muwaje deti rahegi kab tak kasbab jaise anataki is bahart ke mehman bante rahenge,kab tak shivraj singh chuan or manmohan kahenge


mamle ki jaach hogi,doshiao ko choda nahi jayega ,lal banti ka siren bajte huae mantri neta bade asani se moyana karne nikal jate hain,




mumbai ki ye pelhe gathna nhai hain ,isse pelhe bhi dhamko ko mumbai ne dekha hain,mumbai chup hain kyuki woh janti hain ye dhamke thodi der ke liye


  sunyai dete hain,uske bad inhe koi sunane wala or dekhne wala  nhai hain.shyad is bar  koi in dhamko ko sune-----------




mumbai marne walo ko meri shradanjali 



ISHAN MAJUMDAR

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

MANTRIMANDAL MEIN PHEARBADAL -UPA2

amsakr 
             manmohan singh ke team me naye cheare ,ya kahiye batting line up change kar di gayi hain,
ab phearbadal k UPA ki nayiya ko kitni door tak le jayegi yeah to dekhne wali bat hain lekin ,jankaro ka mana hain
phearbadal rajneetik nhai hain ,kahi na kahi sambandho ko manmohan ne nibhya hain sambandh kaise, koi sonia ji ka
karibi hain to koi rahul  jee ka, jaise  milind deora yuva neta ki hoar mein ate hain ,to beni prasad verma ji ek matra
UP se banyege hain 70 sal ke  hain apne ko kurmiya ka neta kehte hain to mantri banne ke liye bhi criteria ban gaya hain
rahul ji ka karibi ho ya koi bade neta ya raj gharne ka ladka ,vishvas nahi haota PMO ke website sath naye mantario ka
profile padh li jiyega 
lekin kahi na khai is phearbadal mein pradahn mantri je dawab mein dikhe jairam ramesh ji IIT bombay se padhe likhe shyad aplog jante ho ya nah ho paryanwran saf karte karte ab gao ko saf karne ki jimadri mil  gayi angrezi mein bolu chaliye enviorment se rural development kai projects thein jo ruke huae thein unke waje se jo is pariwarn ko nukasan kart thein lekin coorparte loaby ka pressure shayad manmohan jheal nhai paye chaliye ,manmohan kehte his talent iis used in cleaning the village and i agreed with his changed ye manmohan keah rahe hain mein nhai,
jate jate kuch or bate, pmo manmohan kehte this was a last reshuffle ek hi shabd mein jane kayiyo ka dil toad  diya
this was a last reshuffle congress ke kai sanasad ya members shyad mantri banne ka khwab dekh rahe honge line mein kafi laloo ji bhi thein is line mein ,scam ka dar bhi dhika shyad phir koi na raja gadi par baith jaye, isliye DMK ke lobby khali rakhi gayi hain--kapil sibal or salman kurshid jee ko anna or baba se handle karne ke double reward mila,to doosari or mukul roy jee ki rail dinesh trivedi ji ke hato  de di gayi hain angrezi akbhar ne linkha hain shunted to dinesh trivedi ,akbhar padhiyega nhai dikhe tab puchiyega tab batunga wahaj kya hain is shunting ki,

sawal yahi utha hain PM sabh ne kaha hain' this was a last reshuffle' kya midterm pol ho sakte hain kahe .samay se phle chunav
kya is phearbadal se UP ke chunav par koi asar padega,shyad manmohan hi jante hain is bat ko ,bolte kum hain wahi jante hain isliye, bol ke lab azad hain tere  manmohan
ISHAN MAJUMDAR

रविवार, 10 जुलाई 2011

कौन बनेगा किसान ईस देश मे ?

ईस देश मे कौन बनेगा किसान chokiye mat yeah koi prashn nahi yeah, yeah sachi hain 8.5% gdp wale  bharat ki .india is shining manmohan to kehte hain lekin kisano ke chere se chamak aj bhi wahi hain jo bees sal pelhe thin
rahul ke dandi march ne kisano ko dekha lekin jana or suna nhai agar dekhte to unhe india shining wala kisan dikhta ,
anajo ko rakhne ke liye abhi tak godam nhi ban sake karz maf kar ke karz lad diye jate hain
18 rupyae sq feet mein kisano ki jameen kharid kar india ko shine kiya jata hain
18 hazar rupaye mein builder ko beach diya jata hain is udarikaran mein na jane kitni bar yojanye bani lekin kisano ki stithi aj bahi nahi badli .

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं।
delhi se door banaras mein hu warna IS 8.5% GDP wale PM se jarror poochta  कौन बनेगा किसान ईस देश मे ?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

uttar pradesh-ek jangal raj

ir aj uttar pradesh ko uttam khaiyega chaliye khete hain dihkne mein lagta bhi hain bade bade malls , park ,is chamak mein shyad kahi andhera bhi hain . hum bat kar rahe us uttar pradesh ki jaha dalit ki beti raj karti hain hum bat karte hain uss uttar pradesh ki jaha dalit ki beti abru bhi loot ti hain.janab garmi apna jaha record tod rahi hain wahi pichle kai dino se crime
ka be graph badha hain. liye chalte hain apko kuch pelhua par baghpat jaha 18 sal ki kadki ka gangraped hota hain,
jaha ,chliye jila bhi bata ta hun baghpat jila, dalit mahila ka balatkar bhi hota  .
badle mein kuch mile na mile muwaja or sarkari wade jarror milte hain,woh to chodiye janab aj ki ghatna se shyad ap
sabhi log wakib honge cmo murder mein peshi ya angrezi mein kahe accused doctor yogendra singh sachan ki jail mein hatya ho jati hain shayd kisi minister ka nam a raha ho wajah koi bhi list badi lambi hain ----------------------------hum to bas tna jana chaenge kya uttar pradesh ab kya ban gaya hain ek jungle raj--------

फेसबुक्रांति

फेसबुक,ट्विटर,ब्लॉग,यू ट्यूब को अनर्गल सोशल मीडिया बता कर खारिज करने वाले जानकारों को एक बार फिर से अपनी समझ के गिरेबां में झांक लेना चाहिए। खाली वक्त में किसी फालतूपने की अभिव्यक्तियों का माध्यम नहीं है सोशल मीडिया। यह एक एक व्यक्ति के मन का एक ऐसे नेटवर्क की दुनिया में विस्तार है जहां कई मन जुड़ जाए तो देश में सियासी बवाल खड़ा हो सकता है। मीडिया पर नियंत्रण के ज़रिये सत्ता सुख भोगने की आदी सरकारों को सोशल मीडिया के ये खुदरा क्रांतिकारी गंभीर चुनौती दे रहे हैं।

मिस्र में होस्नी मुबारक के ख़िलाफ आंदोलन को हवा देने में फेसबुक,ट्विटर,मोबाइल फोन और यू ट्यूब का बड़ी भूमिका सामने आ रही है। लोग महंगाई से तड़प रहे हैं, सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है, मुख्यधारा की मीडिया सत्ता से सांठगांठ कर शांत तो जनता क्या करती। वो सोशल मीडिया के ज़रिये आपस में बात करने लगी। होस्नी मुबारक के सलाहकार इस ताकत को तब तक नहीं समझ पाए जब तक ट्यूनिशिया से चली आंधी उनके महल को उखाड़ने न आ पहुंची। फेसबुकियों ने अपनी आलोचनाओं से ऐसी हवा खड़ी कर दी कि हज़ारों लाखों लोग तहरीर स्कावयर की तरफ निकल पड़े। मिस्र के एक प्रसिद्ध ब्लॉगर अब्बास को सरकार ने गिरफ्तार भी कर लिया। अब्बास ने भी आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने प्रदर्शनकारी तो कभी देखे ही नहीं। मुबारक विरोधी एक फेसबुक समूह से तो नब्बे हज़ार लोग जुड़ गए। इतनी बड़ी संख्या तो आज किसी नेता की सभा में नहीं होती है। पैसे देकर भी लोग लाए जाएं तब भी इतनी भीड़ नहीं आएगी।

अभी तक हम यही समझते रहे हैं कि लोग फेसबुक पर चैट करने वक्त अपने एकाकीपन की बोरियत को खाली कर रहे हैं। ब्लॉगर आत्ममुग्धता का शिकार है। ट्विटर करने वाला बेकार है। सिर्फ इस बात से खुश होना चाहता है कि वह अमुक फिल्म स्टार के ब्लॉग या ट्विटर से जुड़ा है। हिन्दुस्तान में ही लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। राजनीतिक दलों से उनका विश्वास उठ रहा है तो वो आपस में बात कर रहे हैं। दलों के प्रवक्ता प्रेस कांफ्रेंस में एक दूसरे के बयानों की धज्जियां उड़ाकर खुश हैं। ठीक है कि हिन्दुस्तान में करीब सात करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तमाल करते हैं। इस सात करोड़ में से ज्यादातर मुंबई,दिल्ली और हैदराबाद जैसे कोई दस महानगरों में ही रहते हैं। फिर भी इनकी ताकत को अनदेखा करना किसी राजनीतिक मूर्खता से कम नहीं है। मैसूर में रामसेने के खिलाफ दिल्ली की एक लड़की ने फेसबुक पर पिंक चड्ढी कैंपने चलाकर अच्छा खासा आंदोलन खड़ा कर दिया था। आज भी फेसबुक पर कई तरह के ग्रुप बने हुए हैं जिनसे हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं। ये सभी अल्पकालिक आंदोलनकारी कभी भी पूर्णकालीक आंदोलनकारी में बदल सकते हैं। 

आखिर लोग कहां जाए। न्यूज़ चैनलों से आम लोग ग़ायब हैं। कुछ बड़े लोगों के आस-पास ख़बरें घूम रही हैं। उनके इस्तीफा देने या खंडन कर देने भर से पत्रकारिता का महिमामंडन हो जाता है। हिन्दुस्तान में न सही काहिरा और ट्यूनिशिया में उसे एक नया मंच मिल गया है। इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मिस्र में फेसबुक, ट्विटर, न्यूज साइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई क्षेत्रों में मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं। इससे यह धारणा भी बदल जानी चाहिए कि आंदोलन के लिए राजनीतिक दल या नेता को होना ज़रूरी है। कम से कम ट्यूनिशिया या मिस्र में घोषित तौर पर ऐसा नहीं दिखता। लोग अपनी रोज़मर्रा की दिक्कतों से इतने आज़ि़ज आ चुके हैं कि ट्युनिशिया के दक्षिणपंथी इस्लामी संगठन के पीछे खड़े हो गए। मगर जब विपक्षी दल के नेता देश लौटे हैं तो ऐसे भी नारे लगे कि हमें मज़हब के नाम पर बेतुके कानून नहीं चाहिए। 

सबक यह है कि सरकारें प्रेस खरीदने या निंयत्रित करने की कोशिश न करें। लोगों के हाथ में सोशल मीडिया नाम का अस्त्र हाथ लग गया है। ट्यूनिशिया में ही कई ब्लॉगर, नेट आंदोलनकारी जगह-जगह से सूचनाएं और वीडियो अपलोड कर रहे थे। जब तक सरकार उन तक पहुंचती, वे सभी किसी और छद्म नाम से और अधिक लोगों तक पहुंच चुकी होती थीं। सरकारी सेंशरशिप का जवाब मिल चुका है। इंटरनेट तकनीकी की भाषा में इसे साइबरसबवर्ज़न कहते हैं। मतलब आप मेन रोड से नहीं जाने देंगे तो हम गली कूचों से निकल कर गंतव्य तक पहुंच जायेंगे। किसे पता था कि तानाशाहों के मुल्क में सोशल मीडिया लोकतंत्र कायम करने का हथियार बन जाएगा।

इन्हें प्रतिबंधित करने का रास्ता और जोखिम भरा है। ईरान और पाकिस्तान ने भी फेसबुक और यू ट्यूब पर बैन लगा कर देख लिया है। सीरिया में भी फेसबुक के चैट पर रोक लगाई जा चुकी है। चीन में नेट नेशनलिस्ट से सरकार को भी डर लगने लगा है। चीन की विदेश नीति का हिस्सा बनता जा रहा है कि किसी फैसले का इंटरनेट से जुड़े समूह किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। सरकारों को यह समझ लेना चाहिए कि उनके फैसले से आम जनता के बीच बढ़ने वाली खाई किसी भी मंच को राजनीतिक बना सकती है। वो अगर सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की तैयारी में जुटेंगी तो लोग कोई और रास्ता ढूंढ लेंगे। ग्लोबल जगत की पैदाइश ये सोशल मीडिया तथाकथित उदारीकरण से जन्म ले रही असामनताओं को आवाज़ दे रही हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे (मनमोहन की चुप्पी पर विशेष)

वो नहीं बोलते हैं तो ख़बर है। बोलते हैं तो ख़बर है। लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है, यह भी ख़बर है। ख़बर कम है। लोकतंत्र का अपमान ज़्यादा। क्या आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने नहीं आता है। फिर वो क्लास में अपने छात्रों को कैसे पढ़ाते होंगे। अधिकारियों के साथ मीटिंग करते वक्त तो बोलते ही होंगे। अपनी राय तो रखते ही होंगे। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया भर के अनुभवों वाला एक शख्स रबर स्टाम्प ही बना रहे। विश्वास करना मुश्किल होता है। कोई ज़बरदस्ती चुप रह कर यहां तक नहीं पहुंच सकता। कुछ तो उनकी अपनी राय होगी,जिससे उनके धीमे सुर में ही सही बोलते वक्त लगता होगा कि आदमी योग्य है। वर्ना मुंह न खोलने की शर्त पर उनकी योग्य छवि कैसे बनी। मालूम नहीं कि ज़िद में आकर मनमोहन सिंह नहीं बोलते या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है। दोनों ही स्थिति में मामला ख़तरनाक लगता है।

जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।

लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं? 

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है। 

मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना स

DELHI BELLY-AJ KE SAMAJ KA SACH

namskar dosto 
                     namskar ya namste hum kisi ko adar se khete hain chahe wo  humara dost ho ye humse bada.ghabriye mat ye chalan bhi shero ki tarah kahi vilupt na ho jae.hum badal rahe sath mein samaj bhi badal raha hain is badlte samaj se 
    badlna jarrori bhi hain.jab america ka brand chayie to janab badlna to padega hi---
ayie bat karte hain pichle dino ayi flim delhi belly ka humare ek mitr ne bola chalne ko.aamir sabh ka tag tha
dekhne ki lalasa bhi thin .flim ko yuvao ke tarz par banya gaya tha to us line mein bhi aato hun.flim ko shuru se ant tak
yuvao ne khub saraha...........poori flim mein galiyo or ashalita ke siwae koi kuch nhi tha tab bhi hum maje le rahe thein...

sawal ab yaeh utha hain kya ammir sabh jo kabhi samjik ko sandesh diya karte thein unhe aisi flim banae ki zarrort padh gayi
sathiyo aj mein linkhuga nhi jo yaeh note padhe mein unse bas sawal pounch ga kya is flim ne samaj ka assli roop dikhya 
bharat ka yuva galiya dekhne ke 100 rs karch karta hain. 
kis tarah ka sandesh jata hain jab hall mein ladkiya adhe flim ko chaot ke bagh jati hain. 
yaeh bharat hain ammir sabh yeha aj bhi sanskar baki hain kapde bhale branded ho gaye ho.lekin soch abhi bhi bapu ke khadi ki hain 
lekin aj  is flim ne yuvao ki manskita or mansha ko dono ko jhair kiya hain ..............blone ka huk to muje bhi nhi kyuki is ag ke lapth main bhi lakdki ka kamm kar raha tha lekin delhi belly,ragni mms jaise flim bharat ke badlte samaj ka nya roop hain--

लूटों इन किसानों को, विकास बचा लेगा तुम्हें

खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए। इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं। दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए। 

इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है। आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर( अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।

दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है। 

मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए। 

भाई साहब,किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।