मंगलवार, 29 मई 2012


जनसत्ता में एक लेख आया हैं । आज़ादी के 60 साल से लेकर और देश के सविधान बनने पर हर वर्ग और जातियों की स्वायत्तता का ख्याल रखा गया ।खासकर  जब हम बात करे  नीचले वर्ग की तो सबसे पहले दलितों की बस्ती दिखती हैं । अंबेडकर साहब ने सविधान और समाज  में इस वर्ग को जगह दी । दलित नेताओ की कमी नहीं काशीराम ,मायावती ,पुनिया ने इस वर्ग का बेड़ा उठाया ।लेकिन  जब हम नीचले वर्ग और जाती बात करे तो सिर्फ दलित की बस्ती तक क्यों सिमित हो जाते हैं। आदिवासियों के  स्वायत्तता  कहा चली गयी और उनका नेता कौन हैं ।उनके साथ सालों से किए गए वादों को लगातार तोड़ा गया है और जब उनके शोषण में हस्तक्षेप करने दादा लोग (माओवादी) पहुंच गए तो उनका दमन किया जा रहा है। लेकिन उनकी बात समझने के लिए न तो व्यावसायिक मीडिया के लोग तैयार थे, न ही वे लोग जो माओवाद से सहानुभूति रखते हैं डॉ आंबेडकर द्वारा लिखे गए भारतीय संविधान और उसके पीछे काम करने वाले आधुनिकतावादी नजरिए ने एक तरफ आदिवासियों से उनकी स्वायत्तता छीनी और दूसरी तरफ उन्हें उनके जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया। यह दिलचस्प है कि आंबेडकर ने अछूतों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए लिखा है कि वे घुमंतू और बसे हुए कबीलों के युद्ध के कारण पैदा हुए। जो लोग हार गए उन्हें बसे हुए कबीलों ने अपनी रक्षा के लिए तैनात कर लिया। इसके उदाहरण के लिए वे महार जाति का उल्लेख करते हैं। उनके वर्णन में आदिवासी समुदाय आपस में लड़ते रहने वाला और लूटपाट करने वाला समुदाय होता हैं ।
शायद इस जाती को भी एक  आंबेडकर की ज़रूरत हैं जो इनकी लड़ाई लड़ सके ।

रविवार, 27 मई 2012

तीन  साल  का कार्यकाल  

मनमोहन  सिंह  ने अपने तीन  साल  के कार्यकाल  में किये गए  कार्यो  की रिपोर्ट  देश  के सामने  पेश  कर दी ही 
हैं । इस  रिपोर्ट  को  आप  गूगल  पर सर्च  कर देख  भी सकते हैं .तीन  सालो का कार्यकाल  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  और इस  सरकार के लिए  काफी  मुश्किल  भरा  सफ़र  रहा हैं । फिर भी रिपोर्ट  में  कांग्रेस  ने अपने 3 साल की उपलब्धियों   को  गिनाया हैं। अच्छी बात  तो ये हैं  सरकार ने ये बात  मानी हैं 2g  स्पेक्ट्म  जैसे घोटाले  बढ़ती महंगाई ओर  विकास  दर  में कमी  जैसे दिकतो का सामना करना पड़ा   इससे  सरकार की छवि भी ख़राब हुई। 


कांग्रेस  और उसके गटबंधन  वाली सरकार  देश  में  दूसरी  दफे  राज्य कर  रही हैं , इस  से  पहले भी  इसी गटबंधन  वाली सरकार  (UPA -1)  ने  देश  को  चलाया था । दो दिन  पहले  अंग्रेजी  अख़बार ने  वर्तमान 
सरकार (UPA -2)  की तुलना UPA -1 से की .।5 सालो के UPA -1 के  कार्यकाल में  मंहगाई  दर 25.6 % थी  अब वर्तमान में वो बढ़कर 28 % हो गयी हैं। विकास दर कमी   और  रूपये  का  कमजोर  होना।  ये सभी चीज़े वर्तमान  सरकार (UPA -2) के  सिर्फ तीन सालो  के कार्यकाल में दिख गयी ।

सबसे बड़ी  समस्या  जो उभर  कर आ  रही हैं वो हैं मुद्रा सिथ्ती का  डामाडोल  होना .रूपया का हर दिन ओंधे मुँह  गिरना  देश के अर्थयवस्था के लिए कोई शुभ  संकेत नहीं हैं ,प्रणब  मुख़र्जी  ने  इसे   यूरो जोन  संकट  बता  कर इस आर्थिक समस्या  को सुलझाने की  कोशिश की हैं 
और कहा हैं  सरकार इस  समस्या का  हल खोजने के लिए कठोर निर्णय  ले गी .और लिया भी 
सरकारी खर्च  पर कटोती लेकिन ये कटोती उन मंत्रियो के लिए नहीं जो  5 सितारा होटलों में सेमिनार करते हैं।और सरकारी खजानों  पर  विदेश यात्रा करते हैं ।ऐसे में बता  दूँ  ऐसे ही फैसलों   ने फ्रांस और ग्रीस  में लोगो को सड़क में उतरने में  मजबूर किया था ।

दूसरी एक और समस्या  हैं  विदेशी निवेशको की दूरी ।रूपये  के गिरावट  के लिए इसे सबसे बड़ा कारण माना   जा सकता हैं इसलिए RBI ने विदेश में रहने वाले भारतीयों से कहा वो अपने कमाई  का कुछ हिस्सा भारत  में निवेश करे जिससे की मुद्रस्थिथि में कुछ सुधार हो सके ।
तेलेनोर  जैसे विदेश कंपनी यो  का पजीकरण रद कर  दिया गया  उस बात इस स्वित्ज़रलैंड की कंपनी ने भारत  से निवेश हटाने का मन  बना लिया हैं।आज जब सारा विश्व आर्थिक संकट से गुजर रहा हैं और इससे भारत  भी अब अछुता नहीं हैं ।इस सरकार की  सबसे बड़ी समस्या उसके सामने हैं  देश को आर्थिक मजबूती देना ।

दो साल बाद  चुनाव हैं पहले  भी हो  सकते  हैं ऐसे में मनमोहन सिंह जानते हैं लोकतंत्र  की सबसे बड़ी खासियत हैं  3 साल का हिसाब देने पर भी  जनता जवाब 5 साल बाद ही देगी । और इस समय जवाब नकरात्मक हि लग रहे हैं ...