जनसत्ता में एक लेख आया हैं । आज़ादी के 60 साल से लेकर और देश के सविधान बनने पर हर वर्ग और जातियों की स्वायत्तता का ख्याल रखा गया ।खासकर जब हम बात करे नीचले वर्ग की तो सबसे पहले दलितों की बस्ती दिखती हैं । अंबेडकर साहब ने सविधान और समाज में इस वर्ग को जगह दी । दलित नेताओ की कमी नहीं काशीराम ,मायावती ,पुनिया ने इस वर्ग का बेड़ा उठाया ।लेकिन जब हम नीचले वर्ग और जाती बात करे तो सिर्फ दलित की बस्ती तक क्यों सिमित हो जाते हैं। आदिवासियों के स्वायत्तता कहा चली गयी और उनका नेता कौन हैं ।उनके साथ सालों से किए गए वादों को लगातार तोड़ा गया है और जब उनके शोषण में हस्तक्षेप करने दादा लोग (माओवादी) पहुंच गए तो उनका दमन किया जा रहा है। लेकिन उनकी बात समझने के लिए न तो व्यावसायिक मीडिया के लोग तैयार थे, न ही वे लोग जो माओवाद से सहानुभूति रखते हैं डॉ आंबेडकर द्वारा लिखे गए भारतीय संविधान और उसके पीछे काम करने वाले आधुनिकतावादी नजरिए ने एक तरफ आदिवासियों से उनकी स्वायत्तता छीनी और दूसरी तरफ उन्हें उनके जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया। यह दिलचस्प है कि आंबेडकर ने अछूतों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए लिखा है कि वे घुमंतू और बसे हुए कबीलों के युद्ध के कारण पैदा हुए। जो लोग हार गए उन्हें बसे हुए कबीलों ने अपनी रक्षा के लिए तैनात कर लिया। इसके उदाहरण के लिए वे महार जाति का उल्लेख करते हैं। उनके वर्णन में आदिवासी समुदाय आपस में लड़ते रहने वाला और लूटपाट करने वाला समुदाय होता हैं ।
शायद इस जाती को भी एक आंबेडकर की ज़रूरत हैं जो इनकी लड़ाई लड़ सके ।